क्या भगवान राम के बाण से बनी थी सांभर झील? - Sambhar Jheel Ka Itihas, इसमें प्राचीन दंतकथाओं के जरिए प्रसिद्ध सांभर झील के निर्माण की कहानी बताई गई है।
सांभर में विराजी शाकंभरी माता का इतिहास हजारों साल पुराना है जिसका जिक्र महाभारत के साथ कई पुराणों में भी हुआ है। किवदंतियों के रूप में इस जगह का इतिहास रामायण काल से लेकर मुगल काल तक है।
एक किवदंती के अनुसार रामायण काल में इस जगह पर समुद्र हुआ करता था। सीता माता के लिए लंका जाते समय भगवान राम ने समुद्र पर जो बाण छोड़ा था वह इसी जगह आकर गिरा था।
बाण की वजह से यहाँ के समुद्र का ज्यादातर पानी सूख गया और इसके अवशेष के रूप में सिर्फ यह झील रह गई। उस बाण के प्रभाव से आसपास की जमीन भी रेगिस्तान में बदल गई।
एक दूसरी किवदंती के अनुसार महाभारत काल में इस क्षेत्र पर असुर राजा वृषपर्व का राज था और यहाँ पर असुरों के कुलगुरु शुक्राचार्य निवास करते थे।
इसी जगह पर शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ हुआ था। बाद में ययाति का विवाह दैत्यराज वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा से भी हुआ।
आज भी सांभर झील के एक किनारे पर राजा ययाति की इन दोनों पत्नियों देवयानी और शर्मिष्ठा के नाम पर दो कुंड बने हुए हैं।
एक पौराणिक किवदंती के अनुसार दुर्गम नामक राक्षस के कारण इस जगह पर भयंकर अकाल पड़ा और अन्न-जल की कमी से जीव जन्तु मरने लगे। तब दुर्गा माता ने एक नया रूप लेकर यहाँ तपस्या की।
कहते हैं कि माता के आँसुओं की धारा से जमीन पर हरियाली हुई जिससे शाक-सब्जियाँ और फल-फूल पैदा हुए। शाक उत्पन्न करने के कारण माता का नाम शाकम्भरी नाम पड़ा।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer)
इस लेख में शैक्षिक उद्देश्य के लिए दी गई जानकारी विभिन्न ऑनलाइन एवं ऑफलाइन स्रोतों से ली गई है जिनकी सटीकता एवं विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। आलेख की जानकारी को पाठक महज सूचना के तहत ही लें क्योंकि इसे आपको केवल जागरूक करने के उद्देश्य से लिखा गया है। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।
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