Dhool Wala Shahar Poem, इसमें धूल वाला शहर नामक शीर्षक से एक कविता है जिसमें जगह-जगह से खुदी हुई सड़कों वाले शहर के लोगों की परेशानी को बताया गया है।
धूल वाला शहर कविता के बोल - Lyrics of Dhool Wala Shahar Poem
मेरे शहर की सड़कें… सुनो बात ध्यान से…
मेरे शहर में यार रोज़ धूल ही धूल,
सड़कें खुदी पड़ी, सबके चेहरे की बत्ती गुल।
पाइप पड़े इधर-उधर, कदम-कदम पर गड्ढे,
चलना भी मुश्किल, जैसे फँसे हों जकड़े।
बच्चे जाएँ स्कूल तो जूते भी हो जाएँ ब्राउन,
बाइक वाले खांसें, जैसे टूट रहा हो टाउन।
सब परेशान, पर कोई बोले भी तो किससे?
दिन भर लड़ाई साँस की, धूल की इस किस्मत से।
धूल उड़ती, हवा में भर जाती,
सांसों में आकर जलन कर जाती।
देखकर लगता, भाई क्या हाल है?
कोई सुनने वाला नहीं… बस राम ही रखवाला है।
कहीं खड्डा छोटा, कहीं खड्डा बड़ा,
कोई भी चले सड़क पर, चले डरा डरा़।
टैक्सी, ऑटो, पैदल वाला , सबकी है ये कहानी,
हर चेहरा बोलता है, “कब खत्म होगी परेशानी?”
दिन में धूप में धूल, रात में बस अंधेरा,
पूरा शहर पूछता है कब होगा नया सवेरा।
कहते सब, “काम पूरा हो तो शहर चमकेगा,”
तब तक भाई, शांति रखो… टाइम थोड़ा और लगेगा।
धूल उड़ती, हवा में भर जाती,
सांसों में आकर जलन कर जाती।
देखकर लगता, भाई क्या हाल है?
कोई सुनने वाला नहीं… बस राम ही रखवाला है।
सब बोलें धीरे-धीरे, पर अंदर है गुस्सा,
शहर को चाहिए राहत, चाहिए थोड़ा सा सुकून-सा।
पर काम है लंबा, रुकना नहीं चाहिए,
सब झेल रहे, जो चल रहा है चलना चाहिए।
धूल भरा मौसम, और उम्मीद की डोर,
आज मुश्किल सही, पर कल होगा कुछ और।
हालात बदलेंगे और शहर का होगा विकास,
तब तक तू धूल फांक ले मत हो उदास।
आज शहर धूल वाला है कल साफ हो जाएगा
तब तू ही सबसे पहले विकास के गुण गाएगा
तब तू ही सबसे पहले विकास के गुण गाएगा
धूल वाला शहर कविता का वीडियो - Video of Dhool Wala Shahar Poem
अस्वीकरण (Disclaimer):
इस कविता की समस्त रचनात्मक सामग्री रमेश शर्मा की मौलिक रचना है। कविता में व्यक्त विचार, भावनाएँ और दृष्टिकोण लेखक के स्वयं के हैं। इस रचना की किसी भी प्रकार की नकल, पुनर्प्रकाशन या व्यावसायिक उपयोग लेखक की लिखित अनुमति के बिना वर्जित है।
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Poetry
